प्रेतशाप के कारण
नमश्चण्डिकायै,

आज एक कुण्डली में प्रत्यक्ष प्रेतशाप के कारण सन्तान बाधा योग दिखा। जातक के पुत्र नहीं हो रहा था। गर्भ ठहरता नहीं, ठहरता भी तो परिपक्वता से पहले ही गिर जाता। बहुत उपाय किये तथापि कोई लाभ नहीं हुआ। डाक्टरी रिपोर्ट सब नार्मल। हमारे पास कुण्डली आयी तो प्रथम दृष्टि में ही पराशरहोरा शास्त्र में पराशर मुनि द्वारा दिया गया प्रेतरुष्टता के कारण सन्तानहीन योग दृष्ट हो गया।
पराशर ऋषि कहते हैं कि
कर्मलोपे पितॄणां च प्रेतत्वं तस्य जायते ॥९५॥ तस्य प्रेतस्य शापाच्च पुत्राभावः प्रजायते । अतोऽत्र तादृशान् योगान् जन्मलग्नात् प्रवच्म्यहम् ॥९६॥
अर्थात जो मनुष्य अपने मृत पितरों का तर्पण श्राद्धादि क्रिया नहीं करता है, वह मृत मनुष्य प्रेत बन जाता है और प्रेत की रुष्टता के कारण जातक को सन्तान का अवरोध हो जाता है; अतः अब मैं जन्मलग्न के द्वारा सन्तान के अवरोधकारक योगों को बताता हूँ।
पुत्रस्थितौ मन्दसूर्यौ क्षीणचन्द्रश्च सप्तमे । लग्ने व्यये राहुजीवौ प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥९७॥
शनि सूर्य पञ्चम में हो और सप्तम में क्षीण चन्द्रमा एवं प्रथम, द्वादश में राहु-गुरु हो तो प्रेतशाप से जातक सन्तानहीन होता है। जातक की सन्तान नहीं होती अथवा होने पर उसका क्षय हो जाता है।
पुत्रस्थानाधिपे मन्दे नाशस्थे लग्नगे कुजे । कारके नाशभावे च प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥९८॥ लग्ने पापे व्यये भानौ सुते चारार्किसोमजाः । पुत्रेशे रन्ध्रभावस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥९९॥ लग्ने स्वर्भानुना युक्ते पुत्रस्थे भानुनन्दने । गुरौ च नाशराशिस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥१००॥
पुत्रेश शनि अष्टम में, लग्न में मंगल और पुत्रप्रद ग्रह के अष्टम रहने से जातक प्रेतशाप से सन्तानरहित होता है। लग्न में पाप ग्रह, द्वादश में सूर्य, मंगल और शनि, बुध पञ्चम में हो तथा पुत्रेश के अष्टम में रहने से प्रेतशाप से सन्तति नहीं होती है।
लग्ने राहौ स शुक्रेज्ये चन्द्रे मन्दयुते तथा । लग्नेशे मृत्युराशिस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥१०१॥ पुत्रस्थानाधिपे नीचे कारके नीचराशिगे । नीचस्थग्रहदृष्टे च प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥१०२॥ लग्ने मन्दे सुते राहौ रन्ध्रे भानुसमन्विते । व्यये भौमेन संयुक्ते प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥१०३॥
लग्न में राहु, पञ्चम में शनि एवं गुरु अष्टम में हो तो प्रेतशाप से सन्तान का नाश होता है। लग्न में राहु, शुक्र, गुरु, चन्द्र, शनि बैठे हों और लग्नेश अष्टम भाव में हो तो प्रेतशाप से सन्तानहीनता होती है। पुत्रेश नीच में हो, पुत्रकारक ग्रह भी स्वनीच में हो और नीचस्थ ग्रहों द्वारा देखा जाता हो तो प्रेतशाप से जातक सन्तानहीन हो जाता है।
कामस्थानाधिपे दुःस्थे पुत्रे चन्द्रसमन्विते । मन्दमान्दियुते लग्ने प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥१०४॥ वधस्थानाधिपे पुत्रे शनिशुक्रसमन्विते । कारके नाशराशिस्थे प्रेतशापात् सुतक्षयः ॥१०५॥
लग्न में शनि, पञ्चम में राहु, अष्टम में सूर्य तथा व्यय में मंगल से युक्त हो तो प्रेतशाप से सन्तान का नाश होता है। सप्तमेश दुःस्थान में हो, पञ्चम में चन्द्रमा हो तथा लग्न में शनि और गुलिक हो तो प्रेतशाप से सन्तानहीनता होती है। अष्टमेश पञ्चम भाव में शनि-शुक्र से युक्त हो और कारक ग्रह नाशराशि में हो तो प्रेतशाप से सन्तान का नाश होता है।
जातक का लग्न में राहु, पञ्चम में शनि एवं गुरु अष्टम में था जो कि बडा स्पष्ट प्रेतशाप से सन्तान का नाश का योग बनता है। कुछ शुभग्रहों की दृष्टियां आदि भी योग को क्षीण करती प्रतीत नहीं हो रही थी।
प्रेतशाप के कारण जातक की सन्तान नहीं हो रही थी।
इसप्रकार के प्रेतशाप या पितृशाप से सन्ताननाश होने पर उस दोष के शमनार्थ श्रद्धापूर्वक गयाश्राद्ध कराकर दश हजार, एक हजार अथवा सौ ब्राह्मणों को अथवा श्रद्धापूर्वक 10 ही ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए अथवा अपने घर में कन्या हो तो कन्यादान और गोदान करने से जातक पितृशाप से मुक्त होकर पुत्र पौत्रादि की प्राप्ति करता है, जिससे उसके कुल की उन्नति तथा वृद्धि होती है।
प्रेत के उत्पात पर त्रिपिण्डी आदि कराकर प्रेत की शान्ति करा लेनी चाहिए। इससे सन्तति में आने वाले बाधा नष्ट हो जाती है।
